कभी सागर की गहराइयों मैं उतर जाता हूँ,
कभी आकाश के नीले रंग मैं खो जाता हूँ,
मन मैं बहुत कुच्छ होते हुए भी ,
कुच्छ नहीं कह पाता हूँ,
यह कैसी हैं पहेली ,
मैं इसमें उलझ जाता हूँ,
अंधेरी रात मैं भी एक ,
नयी सुबह का सपना सजाता हूँ,
ऐसा कुछ तो हैं ,
जिसकी तालाश में चला जाता हूँ,
काश वोह मिल जाए ,
जिससे यह चेहरा खिल जाए ,
नहीं तो तनहा रहकर भी ,मैं मुस्कुराता हूँ .
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