कल तक जो फिजा का मिजाज़ बताते थे ,
जिनको देखर दरख्त भी हरे हो जाते थे ,
वो आते थे थो पंची भी नए गीत गाते थे ,
अब वोह पंची भी कुच्छ कुच्छ खफा हो गए ,
जाने वोह लोग कहाँ खो गए ,
जो कल तक थे अपने आज अनजाने से हो गए ,
जो उम्मीद की रोशिनी लाये करते थे ,
वोह अब इस अँधेरी रात मैं गुम हो गएजाने वोह लोग कहाँ खो गए......
जो कल तक साया बने रहते थे ,
वोह साए भी सुबह होते ही कुछ धुंधले से हो गए ,
जिन्हें सोचकर चेहरे पर एक मुस्कराहट सी आ जाती थी ,
अब वोहीं नाराजगी का कारण हो गए ,
जो फूल बनकर महकते थे सबको ,
वोह अब एक कांटे की तरह दर्द का सबब हो गए ,
जाने इस भीड़ मैं वोह लोग कहाँ खो गए कल तक अपने से थे ,
अब कुछ बेगाने से हो गए.....